परिचय:
"दोस्तों, आज मैं आपके साथ अपनी एक नई रचना साझा कर रहा हूँ। यह कविता प्रेम, विरह, और अपने प्रिय के सामने पूरी तरह समर्पित हो जाने के गहरे भावों को बयां करती है। उम्मीद है यह आपके दिल को छुएगी।"
हे प्राणप्रिये... सुनले हृदय की पीर प्रिये
हे प्राणप्रिये हे प्राणप्रिये
सुनले हृदय की पीर प्रिये
सुनले हृदय की पीर प्रिये
कितनी बतिया हैं कह डारी
कितनी कहनी शेष हैं,
कितनी कहनी शेष हैं,
मेरे हिय की स्पंदन सुन
तू कितनी विशेष है,
सिर्फ मैं तेरा होके रह जाऊं
ऐसा एक मंतर मार प्रिये II
हे प्राणप्रिये हे प्राणप्रिये
तू तो रचना काशी जैसी
मैं बैठा उसमें पापी हू,
मैं बैठा उसमें पापी हू,
तू तो ठहरी स्वर्ग सुंदरी
मैं मरघट का वासी हू,
जो तन को नष्ट कर डारे
ऐसी एक अग्नि जला प्रिये II
हे प्राणप्रिये हे प्राणप्रिये
तू करुणा की पुष्पकुंज हैं
मैं कीचड़ की उबासी हू,
मैं कीचड़ की उबासी हू,
तू तो हैं, त्रि नेत्रों वाली
मैं काम रूप अभिलाषी हू,
जो मन के वेग को स्थिर कर डारे
ऐसा एक तीर मार प्रिये II
हे प्राणप्रिये हे प्राणप्रिये
तू तो हर्ष में बसने वाली
मैं दुख का कारक हू,
मैं दुख का कारक हू,
तू शुभ की ग्रह चाल
मैं अशुभ का मारक हू,
जो हर कर्मो से मुक्त कर डारे
ऐसा एक उपाय बता प्रिये II
हे प्राणप्रिये हे प्राणप्रिये
तू प्रेम को रचने वाली
मैं बिरह का साथी हू,
मैं बिरह का साथी हू,
तू राग की उच्चतम स्वर
मैं राग बियोग का साथी हू,
जो मुझे जीवित कर डारे
ऐसा एक राग छेड़ प्रिये II
हे प्राणप्रिये हे प्राणप्रिये
यह रचना प्रेमी और प्रियतमा के बीच की विपरीत परिस्थितियों के बावजूद समर्पण को दर्शाती है, जहाँ प्रेमी स्वयं को अल्प और प्रिय को दिव्य मानता है। यह कविता काव्यात्मक सौंदर्य के साथ ही गहरी भावनात्मक अभिव्यक्ति प्रस्तुत करती है।

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